श्रद्धा ही सद्ज्ञान
*************** श्रद्धा ही सद्ज्ञान ************** =================================== तर्क वितर्क गहन शब्दो की मायाजाल इन्सान को भ्रमित कर देती है। गहन शब्दो की फिलसूफ़ीमे संमोहित शिष्य उन्हें ब्रह्मज्ञान समझने लगता है । ध्यान के प्रयत्नोमे दिखनेवाले चित्र विचित्र दृश्यों को महान उपलब्धि समझने लगता है । समजमें न आये ऐसे विधि विधान , कभी न सुने हो ऐसे विचित्र शब्दो वाले मंत्र या तंत्रमार्ग की जूठी ओर भ्रामक प्रचारलीला से आकर्षित होकर सालो तक खुद महान है ऐसा भ्रम पाल लेता है। दो किताब पढ़नेवाले अधूरे महाज्ञानी सबको सलाह देने लगते है । अध्यात्म मार्ग में अपनी मान्यता , कही पढ़ा सुना , किसी ओरो का अनुसरण करना वो सही मार्ग नही है। हरेक व्यक्ति की आंतरिक शरीर रचना , समजदारी , क्षमता अलग अलग होती है । एक सच्चा साधक व्यक्ति की क्षमता अनुसार जो मार्ग दिखाए वो ही करगत हो सकता है । ऋषियो के आश्रम में सभी शिष्यों को एक जैसी विद्या उपासना नही दी जाती थी । व्यक्ति की आंतरिक पहचान कर उनके अनुरूप विधान दिया जाता था । विधान की क्रिया या मंत्र के शब्द सरल हो या गहन कोई फर्क नही पड़...