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*चन्द्र द्वारा बाहरी पीड़ा-*

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*चन्द्र द्वारा बाहरी पीड़ा-* *ग्रह , बाहरी पीड़ा और मैने सबसे ज्यादा एक ही ग्रह पीड़ित देखा जो हमारे मन का कारक है चंद्र ।* *चंद्र जब भी सूर्य , राहु और शनि के साथ होता है तब जातक बाहरी बाधाओ , चिंता , अवसाद और निराशा का शिकार बनता है और भूत बाधा भी ऐसे लोगो को ही होती है।* *चंद्र की युति राहु के साथ कही भी हो और लग्न का स्वामी शनि से पीड़ित हो तो ऐसे जातक फालतू के जादू टोने में ज्यादा पड़ते है।* *चंद्र नीच राशि का हो और लग्नेश अस्त हो साथ ही बुध राहु के साथ हो तो जातक को हमेशा यही भ्रम रहता है की किसी ने उसपर कुछ किया है।* *लग्नेश का अष्टम में होना और उस पर राहु की दृष्टि हो एवम चंद्र सूर्य के साथ युत होकर बारवे भाव में बैठे तो भी जातक इन चीजो से पीड़ित होता है।* *मंगल एकादश में अकेला हो और चंद्र आठवे भाव में हो तो जातक तंत्र का शिकार जरूर होता है शर्त है मंगल स्वराशि का ना हो।* *राहु सूर्य के साथ हो  चंद्र शनि के साथ और गुरु नीच का हो तो भी यह बाधा आती है चतुर्दशी का चंद्र हो तो जातक को मानसिक यातना भुगतना पड़ता है।* *छठवे भाव में चंद्र राहु , आठवे में मंगल और बारवे में शनि ...

शनि और चंद्रमा जब एक साथ कुंडली में हो

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शनि और चंद्रमा जब एक साथ कुंडली में हो .......................................................  चंद्रमा हमारा मन है l  मन  सबसे अधिक चंचल होता है l  चंद्रमा ही हमारा कल्पना है l  कल्पनाशील आदमी तभी हो सकता है जब चंद्रमा स्वतंत्र हो और चंद्रमा बलवान  हो l  यह जलकारक ग्रह है l जल से संबंधित सभी चीजों का यह प्रतिनिधित्व करता है जैसे दूध, जल ,  फल , सब्जी , फूल  l  अगर किसी  पदार्थ  में भी द्रव्य मिश्रित है यानी कि  जल मिश्रित है l  समझ लीजिए कि चंद्रमा का गुण है उसमें चाहे जिस रूप में हो l  जैसे  समझिए घी  इसमें गुरु के साथ-साथ चंद्र का भी योग  है  क्योंकि इसमें जल का अंश है l  इसी प्रकार शराब के साथ है l  जल के साथ-साथ जहर भी है  यानी चंद्रमा और शनि दोनों का योग है  चंद्रमा और राहु भी कह सकते हैं   क्योंकि राहु भी जहर है l स्त्री कारक ग्रह है अतः यह स्त्री का भी प्रतिनिधित्व करता है l   आइए शनि  की बात करते हैं l  कुंडली में अच्छा रहे...

*प्रेत श्राप* Pret Sharap Kya hota hai??

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*प्रेत श्राप* *जन्म-पत्रिका के किसी भी भाव में शनि-राहू या शनि-केतू की युति हो तो प्रेत श्राप का निर्माण करती है | शनि-राहू या शनि-केतू की युति भाव के फल को पूरी तरह बिगाड़ देती है तथा दलदललाख यत्न करने पर भी उस भाव का उत्तम फल प्राप्त नहीं होता है |वह चाहे धन का भाव हो, सन्तान सुख, जीवन साथी या कोई अन्य भाव | भाग्य हर कदम पर रोड़े लेकर खड़ा सा दिखता है जिसको पार करना बार-बार की हार के बाद जातक के लिए अत्यन्त कठिन होता है | शनि + राहू = प्रेत श्राप योग यानि ऐसी घटना जिसे अचनचेत घटना कहा जाता है अचानक कुछ ऐसा हो जाना जिसके बारे में दूर दूर तक अंदेशा भी न हो और भारी नुक्सान हो जाये |  इस योग के कारण एक के बाद एक मुसीबत बडती जाती है यदि शनि या राहू में से किसी भी ग्रह की दशा चल रही हो या आयुकाल चल रहा हो यानी 7 से 12 या  36 से लेकर 47 वर्ष तक का समय हो तो मुसीबतों का दौर थमता नही है |*  *कई बार ऐसा भी होता है किसी शुभ या योगकारी ग्रह की दशा काल हो और शनि + राहू रूपी प्रेत श्राप योग की दृष्टि का दुष्प्रभाव उस ग्रह पर हो जाये तो उस शुभ ग्रह के समय में भी मुसीबतें पड़ती...