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सत्कर्म करते समय क्यों दी जाती है दक्षिणा;?

*सत्कर्म करते समय क्यों दी जाती है दक्षिणा;?* महालक्ष्मी का कलावतार हैं; ‘दक्षिणा’देवी ‘दक्षिणा’ महालक्ष्मीजी के दाहिने कन्धे (अंश) से प्रकट हुई हैं इसलिए दक्षिणा कहलाती हैं। ये कमला (लक्ष्मी) की कलावतार व भगवान विष्णु की शक्तिस्वरूपा हैं। दक्षिणा को शुभा, शुद्धिदा, शुद्धिरूपा व सुशीला–इन नामों से भी जाना जाता है। ये उपासक को सभी यज्ञों, सत्कर्मों का फल प्रदान करती हैं। गोलोकबिहारी श्रीकृष्ण और दक्षिणा का सम्बन्ध!!!!!!!! गोलोक में भगवान श्रीकृष्ण को अत्यन्त प्रिय सुशीला नाम की एक गोपी थी जो विद्या, रूप, गुण व आचार में लक्ष्मी के समान थी। वह श्रीराधा की प्रधान सखी थी। भगवान श्रीकृष्ण का उससे विशेष स्नेह था। श्रीराधाजी को यह बात पसन्द न थी और उन्होंने भगवान की लीला को समझे बिना ही सुशीला को गोलोक से बाहर कर दिया।   गोलोक से च्युत हो जाने पर सुशीला कठिन तप करने लगी और उस कठिन तप के प्रभाव से वे विष्णुप्रिया महालक्ष्मी के शरीर में प्रवेश कर गयीं। भगवान की लीला से देवताओं को यज्ञ का फल मिलना बंद हो गया। घबराए हुए सभी देवता ब्रह्माजी के पास गए। ब्रह्माजी ने भगवान विष्णु का ध्यान किया। भग...

श्रद्धा ही सद्ज्ञान

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*************** श्रद्धा ही सद्ज्ञान ************** ===================================     तर्क वितर्क गहन शब्दो की मायाजाल इन्सान को भ्रमित कर देती है। गहन शब्दो की फिलसूफ़ीमे संमोहित शिष्य उन्हें ब्रह्मज्ञान समझने लगता है । ध्यान के प्रयत्नोमे दिखनेवाले चित्र विचित्र दृश्यों को महान उपलब्धि समझने लगता है । समजमें न आये ऐसे विधि विधान , कभी न सुने हो ऐसे विचित्र शब्दो वाले मंत्र या तंत्रमार्ग की जूठी ओर भ्रामक प्रचारलीला से आकर्षित होकर सालो तक खुद महान है ऐसा भ्रम पाल लेता है। दो किताब पढ़नेवाले अधूरे महाज्ञानी सबको सलाह देने लगते है । अध्यात्म मार्ग में अपनी मान्यता , कही पढ़ा सुना , किसी ओरो का अनुसरण करना वो सही मार्ग नही है। हरेक व्यक्ति की आंतरिक शरीर रचना , समजदारी , क्षमता अलग अलग होती है । एक सच्चा साधक व्यक्ति की क्षमता अनुसार जो मार्ग दिखाए वो ही करगत हो सकता है । ऋषियो के आश्रम में सभी शिष्यों को एक जैसी विद्या उपासना नही दी जाती थी । व्यक्ति की आंतरिक पहचान कर उनके अनुरूप विधान दिया जाता था । विधान की क्रिया या मंत्र के शब्द सरल हो या गहन कोई फर्क नही पड़...

*चन्द्र द्वारा बाहरी पीड़ा-*

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*चन्द्र द्वारा बाहरी पीड़ा-* *ग्रह , बाहरी पीड़ा और मैने सबसे ज्यादा एक ही ग्रह पीड़ित देखा जो हमारे मन का कारक है चंद्र ।* *चंद्र जब भी सूर्य , राहु और शनि के साथ होता है तब जातक बाहरी बाधाओ , चिंता , अवसाद और निराशा का शिकार बनता है और भूत बाधा भी ऐसे लोगो को ही होती है।* *चंद्र की युति राहु के साथ कही भी हो और लग्न का स्वामी शनि से पीड़ित हो तो ऐसे जातक फालतू के जादू टोने में ज्यादा पड़ते है।* *चंद्र नीच राशि का हो और लग्नेश अस्त हो साथ ही बुध राहु के साथ हो तो जातक को हमेशा यही भ्रम रहता है की किसी ने उसपर कुछ किया है।* *लग्नेश का अष्टम में होना और उस पर राहु की दृष्टि हो एवम चंद्र सूर्य के साथ युत होकर बारवे भाव में बैठे तो भी जातक इन चीजो से पीड़ित होता है।* *मंगल एकादश में अकेला हो और चंद्र आठवे भाव में हो तो जातक तंत्र का शिकार जरूर होता है शर्त है मंगल स्वराशि का ना हो।* *राहु सूर्य के साथ हो  चंद्र शनि के साथ और गुरु नीच का हो तो भी यह बाधा आती है चतुर्दशी का चंद्र हो तो जातक को मानसिक यातना भुगतना पड़ता है।* *छठवे भाव में चंद्र राहु , आठवे में मंगल और बारवे में शनि ...

*राहू -केतू का प्रभाव-*

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*राहू -केतू का प्रभाव-* *राहु-केतु दोनों ही छाया ग्रह हैं। कुंडली में यह सूर्य एवं चंद्र के साथ ग्रहण योग बनाते हैं। राहु भ्रम और केतु चिंताओं एवं कुल की वृद्धि का सूचक है। कुंडली में इनकी स्थिति जातक के जीवन को बहुत प्रभावित करती है। यह दोनों ग्रह सदैव पीड़ा करक नहीं होते। कुंडली में कुछ भावों और ग्रहों के साथ यह जातक को विशेष शुभ फल प्रदान करते हैं। आइए जानते हैं कैसे राहु और केतु की स्थिति जातक के जीवन को प्रभावित करती है।* *राहू की बिभिन्न ग्रहों से युति के विशेष फल-* *राहू-बुध की युति – संकुचित सोच और झूठ बोलने की प्रवृति।* *राहू-शुक्र की युति – अति कामुक।* *राहू-शनि से युति – तंत्र मंत्र का जानकार किन्तु दरिद्र।* *राहू-गुरू से युति – हठ योगी या योग अभ्यास में कुशल।* *राहू-मंगल से युति – खतरनाक कार्यों को करने वाला।* *राहू-सूर्य – खराब आचरण वाला।* *राहू-चन्द्रमा से युति – जीवनभर मानसिक तनावों से परेशान रहने वाला।* *केतु की बिभिन्न ग्रहों से युति के विशेष फल-* *केतु-बुध की युति – लाइलाज बीमारी देता है। पागल, सनकी, चालाक, कपटी, चोर एवं धर्म विरुद्ध आचरण बनाता है।* *केतु-श...

महाराज भगीरथ के कठिन प्रयासों से गंगा अवतरण की कथा.....।।

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महाराज भगीरथ के कठिन प्रयासों से गंगा अवतरण की कथा.....।। भगवती गंगा का धरती पर अवतरण सतयुग में ज्येष्ठ शुक्ल दशमी तिथि वृहस्पतिवार को हुआ था। प्रस्तुत है माँ गंगा के अवतरण की कथा। पवित्र गंगा नदी:- गंगा, जाह्नवी और भागीरथी कहलानी वाली ‘गंगा नदी’ भारत की सबसे महत्वपूर्ण नदियों में से एक है। यह मात्र एक जल स्रोत नहीं है, बल्कि भारतीय मान्यताओं में यह नदी पूजनीय है जिसे ‘गंगा मां’ अथवा ‘गंगा देवी’ के नाम से सम्मानित किया जाता है। एक पौराणिक कथा के अनुसार गंगा पृथ्वी पर आने से पहले सुरलोक में रहती थी। गंगा का पृथ्वी पर आना-जाना:- तो क्या कारण था जो यह पवित्र नदी धरती पर आई। इसे यहां कौन लाया? गंगा नदी के पृथ्वी लोक में आने के पीछे कई सारी लोक कथाएं प्रचलित हैं, लेकिन इस सबसे अहम एवं रोचक कथा है पुराणों में। एक पौराणिक कथा के अनुसार अति प्राचीन समय में पर्वतराज हिमालय और सुमेरु पर्वत की पुत्री मैना की अत्यंत रूपवती एवं सर्वगुण सम्पन्न दो कन्याएं थीं। पर्वतराज हिमालय की पुत्री गंगा:- दो कन्याओं में से बड़ी थी गंगा तथा छोटी पुत्री का नाम था उमा। कहते हैं बड़ी पुत्री गंगा अत्यन्त प्...

देश हित में योगदान करें। #fight Cronavirus

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आज पूरा देश कोरोना नामक वैश्वीक महामारी से ग्रसित है और इस कठिन समय में आप समस्त देशवासी माननीय प्रधानमंत्री जी के निवेदन अनुसार आपसे जितना संभव हो सके अपनी क्षमता अनुसार देश हित में योगदान करें । योगदान के लिए कोई भी सीमा तय नहीं है यह ११ रूपए से लेकर आपके सामर्थ्य अनुसार कुछ भी हो सकता है।  आप सभी बंधुजनो से विनम्र निवेदन है कि आप अपने अंशदान के बाद अपने स्क्रीन शाट कमैंट कर के अवश्य भेजें जिन्हें हम आने वाले समय में अपने पेज पर पोस्ट करेंगे।।  घर में रहें सुरक्षित रहें स्वस्थ रहें।  धन्यवाद 

एक हुआ था रक्त बीज - राक्षस !

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एक हुआ था रक्त बीज - राक्षस ! रक्तबीज एक ऐसा दानव था जिसे यह वरदान था की जब जब उसके लहू की बूंद इस धरती पर गिरेगी तब तब हर बूंद से एक नया रक्तबीज जन्म ले लेगा जो बल , शरीर और रूप से मुख्य रक्तबीज के समान ही होगा | अत: जब भी इस दानव को अस्त्रों ,शस्त्रों से मारने की कोशिश की जाती , उसके लहू की बूंदों से अनेको रक्तबीज पुनः जीवित हो जाते | रक्तबीज दैत्यराज शुम्भ और निशुम्भ का मुख्य सेनानायक था और उनकी सेना का माँ भगवती के विरुद्ध प्रतिनिधित्व कर रहा था |  शिव के तेज से प्रकट माहेश्वरी देवी , विष्णु के तेज से प्रकट वैष्णवी , बह्रमा के तेज से बह्रमाणी भगवती के साथ मिलकर दैत्यों से युद्ध कर रही थी | जब भी कोई देवी रक्तबीज पर प्रहार करती उसकी रक्त की बूंदों से अनेको रक्तबीज पुनः जीवित हो उठते | तब देवी चण्डिका ने काली माँ को अपने क्रोध से अवतरित किया | माँ काली विकराल क्रोध वाली और उनका रूप ऐसा था की काल भी उन्हें देख कर डर जाये |  देवी ने से कहा की तुम इस असुर की हर बूंद का पान कर जाओ जिससे की कोई अन्य रक्तबीज उत्पन्न ना हो सके | ऐसा सुनकर माँ काली ने रक्तबीज की गर्दन का...